फिर मिलना तुम

*एक साँझ,,,,
*फिर मिलना तुम मुझे उसी तरह*
*सागर के एकांत छोर पर*
*सिर्फ और सिर्फ मेरी प्रतीक्षा करते हुए*
*जहाँ टिमटिम करते हुए*
*कितने ही टूटे बुझते सितारे*
*तेज हवाओं से बचाकर*  
*छुपा आये थे हम तुम साथ मिलकर* 
*नम रेत के गहरे भीतर ...*
*कभी फुर्सत में* 
*इनसे अपने मन की कह लेने को,,,*
*बरसों गुज़र गये सपनो को तोलते*
*जीवन की अनसुलझी गुत्थियों को खोलते*
*ख्वाहिशों की सब बातें वक्त पर टालते*
*मन का पंछी तो रोज ही उड़ा है* 
*लम्बी ऊँची उड़ाने,*
*कितनी ही बार देखा मैंने उसे*
*तुम्हारी पलकों पर बैठ* 
*थकन भरी उच्छवास लेते*
*सकुचाई सी व्यापकता बटोरे* 
*खुले अधखुले अधरों पर*
*जब तब आ बैठी सहमी ठिठकी* 
मुस्कानों के मन्द हिलकोरों में*
*उम्मीद करती हूँ ...नही खोले होंगे तुमने*
*मेरे बिना वो बन्द कपाट*
*वो ज़मीन अब तक होगी वैसी ही*
समतल और सपाट
*न जाने क्यों ,,,,*
*एक दिन तो उग ही जाता है रोज*
*उलझनों की फेहरिस्त लेकर*
*पर अब शामें नही ढलती*
*बेफ़िक्रियों की फुर्सत लिए* 
*सुनो....उधर की रेत पर* 
*कुछ नमी तो बसी होगी न अब तक ?* 
*बदलते वक्त के साथ लहरों ने कहीं* 
*उधर आना जाना तो नही छोड़ दिया?*

*प्रियंवदा*

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