रात बड़ी गहरी है

कितनी ही बार किया जब ख्याल
कि बस रोक दूँ यही उसके पाँव
मन के पंछी को अब दे ही दूँ
कुछ पल सुकून ओ आराम ....
तमन्ना जोर से फडफड़ाई
शायद बात उसे बिलकुल न भायी
भीतर से किसी ने
बिलबिलाते हुए गुहार लगाई
गुपचुप किसी कोने ने
फिर से आँगन में आग जलाई
सेकने लगी सिमटी हथेलियां
ठिठुरती हुई तन्हाई
कफ़न ओढ़ धरती बुदबुदाती है
फिर फिर ये स्याह रात
क्यों कर चली आती है ...
भीतर कोई सिहरता सा सन्नाटा
फुसफुसाता है,,,,,,,
ऐसे भी कोई किसी का साथ निभाता है
माना रात बड़ी गहरी है
ठहर जा ओ दीवानी
ये तो बस एक चाँद के लिए ठहरी है
प्रियंवदा अवस्थी
2015

Comments

Popular posts from this blog

मत बीतो ऐसे तुम मुझमे

बहुत दूर चलना एकाकी

पतझर के मौसम जवानी की फुनगियां