आज फिर मैंने तुमको देखा
आज फिर मैंने तुमको देखा
ओ प्रिय सतरंगी
डबडबाई सी इन आँखों में
चिटक छिटक बिखरता
तुम्हारा वही इंद्रधनुषी रूप
आज फिर मैंने तुमको देखा
गीले केशों की कोरों पर
नाचती आकाशगंगाओं संग
दिव्यता का पर्व मनाते
आज फिर मैंने तुमको देखा
ओ प्रिय कंचनकाय
बदलियों के पार से दिन भर
गुपचुप ताक झाँक करते
बसंती बयारों के कानो में
फागुनी झुमके टांकते
आज फिर मैंने तुमको देखा
ओ प्रिय सतरंगी
तुम जो दीखते जगत को को
एक रंग एकाकार
हो सचमुच के स्वर्णकार
कितने रंग भर देते हो
एक चितवन भर से
छाई नम उदासियों में
करीने से गर्म लाख भरते
पत्तों पत्तों पर अपने नेह की
नक्काशियां गढ़ते,,,,,,,,
आज फिर मैंने तुमको देखा,,,,
प्रियंवदा अवस्थी
2015
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