और तुम कहते ये छोटी बात

पखवारों दर पखवारों जब
क्या कुछ न सहेज लेती है
एक सियाह अँधेरी रात
तब जाकर आते हो प्रिय
चाँद तुम लेकर अपने हाथ
और तुम कहते ये छोटी बात.........
क्या जानो तुम वो पीड़ाएँ
तृण तृण अन्धकार पीने की
जीवन साधन सुलभ असहय
एक पीड़ा, तुम बिन जीने की
दिन कटते पोरों को गिनकर
डसे सर्पिनि सी बिरहिन रात
और तुम कहते ये छोटी बात...
धुन धुन बादल कातूं कपास
तानी तब जीवन की दोहर
झिलमिल बूटे स्वप्निल कोरों
रचूं काढूँ जब दिन दिन भर
बिहरूँ लेकर प्यास विकल
किंछते नभ थल पर विश्वास
और तुम कहते ये छोटी बात....
एक छाप हो तो भी निभ जाती
एक चादर रुपहली सी बन जाती
तुमको नित ही रूप बदलना है आया
धूप छाँह से लड़भिड़ के तुमको पाया
हृदय दाह जली ठिठुरी जब काया
झरी अगणित मौसम बरसात
और तुम कहते ये छोटी बात ......
करूँ शिकायत तो नादानी लगती है
रोज रोज की कही कहानी लगती है
निज पथ पे चलते जाना नियति लेकिन
बिन माझी कभी नाव किनारे लगती है
विटप लता से बिछड़ गिरे ज्यों
सहे हर पवन विषम के घा
और तुम कहते ये छोटी बात ......
प्रियंवदा अवस्थी

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