प्रणय क्या देहों का अभिसार

प्रणय क्या देहों का अभिसार
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आज बड़े चुप चुप हो दिखते
क्या मुझको पाती हो लिखते
जो पूंछा तुमसे कईयों ही बार
प्रणय क्या देहों का अभिसार।।

नयन के मेल देख प्रियतम
अकारण जग रिसियता है
ये जाने सत्य यहां सब ही
गगन पृथ छू नही पाता है ।।

चढो तुम नभ खिड़की जब भी
फेर लूँ दृष्टि ? बात अति की
जलन पूनम को होती मुझसे
अमावस सहमे , हतप्रभ सी ।।

इन्हें तो कुछ बात बनानी है
सत्य से जो अभिग अजानी है
प्रीत की बात तनिक चलते
क्लेश कर भृकुटि चढ़ानी है ।।

विचलती इनको उत्तर क्या दूँ
समर्पण छिन्न ध्वस्त कर लूँ ?
लगे इन प्रश्नों पर पूर्ण विराम
रमें जा अब ये निज निज काम ।।

मेलापक दृष्टि औ दिशाओं का
दीर्घ लघु अगिन निशाओं का
सूर्य की चढ़कर पावन वेदी
सृष्टि की रचना बेला जब थी।।

काल ने ये गठबंधन था बाँधा
ऋतुओं ने थामा जब कांधा
वचन भरे नक्षत्रों के सम्मुख
निभाएंगेै संग सुख औ दुख ।।

जगत की कुगढ़ रची रीती
क्या जाने प्रणय प्रेम वीथी
प्रणय कहे ये देहों की युति
सुधारो अब समूल तुम त्रुटि

अजब यह लोक कहें संसार
कठिन इससे करना तकरार
संग रहें युगल तभी क्या प्यार
भले मन वच के हों टूटे तार ।।

करूँ इस शंका  का परिहार
अलौकिक तेरा मेरा ये प्यार
बता दो लिख सबको एक बार
प्रश्न तो कोटिश लाख हजार ।।

प्रणय क्या देहों का अभिसार ।।
प्रियंवदा अवस्थी

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