एक टुकड़ा चाँद का
एक जो टुकड़ा चाँद का
मिल जाये जो मुझको कहीं
अपने मस्तक पर सजा
मैं तो चांदनी बन जाउंगी
पिरोकर झिलमिल सितारे
ओढ़नीे के हर छोर पर
ओढ़ चूनर इस स्याह तन
मैं प्रिय मुखर हो जाउंगी
भीगी भीगी सी एक कहानी
वो जो भी कहेगा रात भर
नमी पलकों पे ढाँप कर
सुबह ओस सी झर जाउंगी
पत्तों पत्तों पर दमकती
पढ़ बात अपनी प्रीत की
अधरों अधरों खिल उठूँगी
फिर सांझ ढल शर्माऊँगी
युगों से जब अपनी कहानी
गढ़ ही रहे ये धरती गगन
सुन के ताने जगत के प्रिय
मैं क्यों भला घबराऊँगी।।।
प्रियंवदा
Comments
Post a Comment