सुख देखा तुझे मैंने
सुख....
तुझे देखा था मैंने एक दिन
पीड़ा के उथले आँगन में
सबसे बेफ़िकर
गिल्ली डंडा खेलते
ताज्जुब भी हुआ बहुत
तेरे जन्मदाताओं पर
कैसे छोड़ दिया तुझे अकेला
यूँ ही मंडराने को,इधर उधर
चिलचिलाती धूप ,
धूल भरे मौसम,
नँगे पाँव ...भरी दोपहर
ऐ सुख !देखा मैंने तुझे
अकेला ही तू था कितना निमग्न
काठ के एक दो मुंहे खिलौने पर
अपना पूरा ध्यान केंद्रित कर
कितना उत्साहित था तू
समय की घात संग
उसपर अपने अगले प्रहार पर
सुख,,,,देखा था फिर तुझे मैंने
उस एक दिन पीड़ा की सीली माटी में
लोट विजय का आनन्द लूटते
उपेक्षित बूढी हो आई नीम पर
जा अटकी तेरी गिल्ली के वार से
झर झर पड़ी धूल में लिपटी
पकी निबौलियों को
रस ले लेकर चखते....
ऐ सुख.....देखा तुझे मैंने
उस एक दिन आज के बहरे कानों में
कल की फूँक मार कर
फिर कोई शातिराना चुहल करते....
प्रियंवदा अवस्थी 2015
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