पार जुलाहा बैठा है

एक चादर हुई झीनी तो क्या
कोई ग़म मत कर यार
उस पार जुलाहा बैठा है 
और हम आये मझधार,

मैल कुचैली फटेहाल 
अब ये कैसी भी है
धोहु पखारू ओढ़ ढाँक
ये सूरत कैसी भी है
दिन दोपहरी साँझ रात
हों कितने ही विकट प्रहार

अभी देह ढाकन को काफी
मुख काहे ये मलिन उदासी
हर एक वस्तु चमकती सी
फिर फिर हो जावे है बासी
नूतन बिसहन बाट जोहती
तुम अब जेब भरो भरमार

धुनधुन जीवन रुई उंगलियन
कर्म लपेट रहा निज तकली
रुच रुच उसने जाने कितनी
चादर की क़िस्मत है बदली
हाड मास की फ़िक्र करे क्यों
तू स्वेद बहा ले जीवन धार

कर्म अकर्म दिशा कर ध्यान
पवन करे कितने फिर वार
एक शाम हम पार लगेंगे
खेवो मौज बीच पतवार
कुछ दिन सोना हो सो लेंगे
बिना वसन दसन की खाट
पार जुलाहा बैठा है,,,,,,

प्रियंवदा

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