कैसा ये रिश्ता
कि बार बार लगातार
मुझसे ही
सिर्फ एक ही प्रश्न मेरा
कि कौन वो मेरा ..
क्या है ये नाता गहरा
कि दिखे वो मेरा हो मुझमे ही
हर सीरत से गुज़र
हर सूरत में ठहर,
ये उसका बार बार
कुछ छूकर गुज़र जाना ...
यूँ ही गुज़रते छू कर जाना ,
अजब है कशिश,
आभास का अहसास बन जाना
खुले बन्ध में बँध जाना
तो कभी बंधे बिंधे
बिखर बिखर जाना
सुनो प्रिय !
कैसा ये रिश्ता तुमसे
अब तक न जाना ....
2013 प्रियंवदा
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