कुछ गुनगुनी ये हवा हो चली है

कि कुछ गुनगुनी ये हवा हो चली है
महक सी उठी है गली आज दिल की
हुई शोख ऐसी निगाहें निगाहों
कि नीयत बदल ही गयी क़ातिल की

लगी को जलाकर शबें की थी रोशन
बिछाते रहे ख्वाब के हम बिछौने
आये और आकर मुड़े कितने मौसम
भरम ही लगे ज़िन्दगी के खिलौने

जलाएं चलो अब शमा ए मोहब्बत
सजाएं फिर महफ़िल कही अनकही की,

अब तक लिखे जो ख्याल कागज़ों पर
जो कल तक सुनाते रहे हम हवाओं,
कहें सारी बातें सुनें कुछ फ़साने
नए रंग भर दें चलो इन फ़िज़ाओं

फ़लक को ज़मीन पर सजा दें चलो हम
कि चाँद आज चूमें हथेली ज़मीन की

कि कुछ गुनगुनी ये हवा हो चली है
खिल खिल उठी हर कली आज दिल की
हुई शोख ऐसी निगाहें निगाहों
कि नीयत बदलने लगी कातिल की
प्रियंवदा

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