जीवन प्रतिध्वनि
उस एक टीले पर,
जहाँ हम और तुम
मिला करते थे अक्सर...
बेमौसम, बेसबब
हवाओं से बतलाते
मौन तोड़ते, फिर चुप जाते...
सूरज चाँद से छिपते छिपाते
आँखों में आँख डाले
हाथों में हाथ थामे,,,
दूर तक चले जाते....
फिर लौट आते,,
गुम गए जाने किधर
वो पल भरी दोपहर...
दुनिया की भीड़ में,,
तुम, मैं और कितनी ही
अबोली बातें......
कल उसी मंज़र पर
उसी टीले पर चढ़कर
मैं एक आवाज़ छोड़ आई हूँ
तुम्ही कहा करते थे न अक्सर
जो कुछ भी तुम यहां छोड़ोगी
तुम तक आएगा फिर,
वैसा ही लौटकर
प्रियंवदा
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