तुम्हारी याद फिर आई

बड़ी तीखी मारे धार पुरवा निकसी बांध कटार
घायल विरहिन निराधार घटा घन प्यास अकुलाई
तुम्हारी याद फिर आई,,,,

चितव आकाश पे मृग मोर करें हैं बाग़ बगियन शोर
नयन अब कौन बाँधूँ डोर खींचे आ जाओ जो इस छोर
चिटक धरती ये पथरायी ,,,,,
तुम्हारी याद फिर आई,,,,

अगन बरसी बहुत इस जेठ,घमसा आषाढ़ लाठी टेक
पुकारे ताल माटी लेप, आंजते आँख तपती रेत
झुलस तन प्रीत मुरझाई ,,,,,
तुम्हारी याद फिर आई

नही अंगना में शीतल छाँव निरा सूना लगे है गांव
जगे एक आस हर आहट, पवन साँकल से खेले दांव
प्रतीक्षा आँख उथलायी,,,,
तुम्हारी याद फिर आई,,,,

खड़े हम ठूंठ बन खलिहान भाये कब तक कोरा पिसान
चुने गिन गिन कई बिहान, भिगोये आंसुओं वो धान
तके तेरी बाट रोपाई ,,,,
तुम्हारी याद फिर आई

प्रियंवदा

Comments

Popular posts from this blog

मत बीतो ऐसे तुम मुझमे

बहुत दूर चलना एकाकी

पतझर के मौसम जवानी की फुनगियां