नमक सहेजना भी ज़रूरी

तुम !!!
मुझमे समाहित एक समन्दर
कितनी ही बार
तपते उमसते ढलके हो
इन नयनो से हो
अधरों तक....
कितने ही घूंट खारे पिए
ताकि उर्वर रहे ये ज़मीन
जब तब ढलकते फिसलते
तो सीले फफूंदे खलिहान होते
बस कुछ दिन और
बिंधे रहो यूँ ही इन आँखों में
फिर साथ मिल बरसेंगे दोनों
भीगते भिगाते
फसलें रोपेंगे नर्म ख्वाबों की
परोसी इन थालियों में
सिर्फ मीठे निवाले
कब भाये हैं किसी को,
तुम्ही ने कहा था न एक दिन
ज़िन्दगी मीठी बनाने को
कुछ नमक सहेजना भी ज़रूरी है
प्रियंवदा

Comments

Popular posts from this blog

मत बीतो ऐसे तुम मुझमे

बहुत दूर चलना एकाकी

पतझर के मौसम जवानी की फुनगियां