निगोड़ी ,कब हुई किसी में थोड़ी

सच!!
कितना मुश्किल है
उसे उसकी कीमत समझाना
उतना ही उसे समझ भी पाना
नादां ठहरी , ये निगोड़ी
कब हुई भला किसी में थोड़ी...
भाये इसे बस तन पर ही इठलाना
भरमाना,रीझना और रिझाना
बेसबब बेबात ही मुस्काती है,
कुछ एक दिन से
जाने क्यों मुझसे
बात बात पे रूठ जाती है...
कभी बालों, बेरंग हो ढलक जाती है
कभी झुर्रियों ,सहम ठिठक जाती है
कमसिन ...
जाने कब ये बात समझ पायेगी
कि वो तन से ज्यों ज्यों उतरती जायेगी
मन पर तो कुछ और ही गहरायेगी...
प्रियंवदा

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