कल आज और कल

कितने ही वर्तमान स्वाहा किये
हमने और तुमने,
कल को सोचकर
पुनश्च कल की सोचकर
बैठकर क्षितिज की कोर पर
दोनों तरफ रखी हुई,
ज्वलनशील समिधाओं के मध्य
मन्त्रमुग्ध से शरीर ,
और सम्मुख धधकती हुई
सिर्फ और सिर्फ ज्वाला,,,,
एक कल को लील लेने के बाद
दूसरे को भस्म कर देने को आतुर,
उपलब्ध और उपलब्धि
दोनो को ही जहाँ अंततः
हो ही जाना है जब आहुत
फिर भी जानबूझकर मन
करता रहता हैे उससे मूढ़ प्रश्न
क्षितिज की कोर , बैठकर हर रोज
सुखद सम्भावनाओं की
सदा सर्वदा से करते हुए
एक अंतहीन खोज....
हर दिन के उगते हुए सूरज से
एक पिघलती हुई शाम तक,,,,,

प्रियंवदा

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