तब जाकर आते हो प्रिय
पखवाड़ों दर पखवारो क्या कुछ
न सहेजती है जब स्याह रात
तब जाकर आते हो तुम प्रिय
कहीं चाँद लेकर अपने हाथ ।।
और तुम कहते ये छोटी बात,,,,
क्या जानों तुम पीड़ाएँ तृण तृण से अंधकार पीने की
जीवन साधन सुलभ, असह्य पीड़ा तुम बिन जीने की
दिन काटे पोरों को गिनते कटी है कैसे बिरहन रात
और तुम कहते ये छोटी बात,,,,,
धुन धुन बदरा काती कपास जब दिन के तीन पहर
झिलमिल कोरों स्वप्निल बूटे काढ़े हैं दिन दिन भर
हृदय दाह ठिठुरी काया नयन झरी बेमौसम बरसात
और तुम कहते ये छोटी बात,,,,,
एक छाप होती जो तेरी तब भी अपनी निभ जाती
एक सजीली चादर मन के छत आँगन ढक जाती
तुम को नित ही रूप बदल मिलना भाया
धूप छाँह से लड़ भिड़ कर ही तुमको पाया
किस किस राह चली निशा तब आई उजेरी रात
और तुम कहते ये छोटी बात,,,,,,
Comments
Post a Comment