रंग रंग के रंग
सुनो
मुझमे बसने वाले मेरे तुम
खुशियों का रंग कभी देखा है तुमने?
फिर कहते हैं लोग उसे
कभी सुर्ख तो कभी गुलाबी
कभी हरी तो कभी इंद्रधनुषी
वस्तुतः खुशियों का कोई रंग नही होता
फिर भी वे सतरंगी कही जाती है.....
क्या पीड़ा का रंग कभी देखा है तुमने?
देखा तो कभी मैनें भी नही
किन्तु पीड़ा को अँधेरों के कांधे ढुलक
आपस में एकरंग होते
अक्सर महसूस ज़रूर किया है........
मन के कोरे केनवास पर
सुख दुःख हर्ष उल्लास और शांति के
तयशुदा या मनभावन रंगों से
अजब गजब चित्रकारियां करते रहे हो तुम
चेहरे पर सहज, कुदरती मुस्कान लिए
होठों को सुर्ख गालों को गुलाबी
ओढ़नी को धानी घाघरी को बसंती
सांझ और सुबह को सुनहरी रंग दिया है तुमने,,,,
आसमान में साँसों सी गहराई का
और समंदर की लहरों पर
उफान का फेनिल रंग
चढ़ाते देखा है कितनी ही बार तुम्हें.....
रंगों के रूप और असल मायने
तुमने ही तो समझाए हैं मुझे
सावन में लहलहाते खेतों के बीच बैठकर
पुरवा के झोंकों से बिखर गई
लट को मेरे माथे से हटाते ही
कैसे छम से उतर पड़ती थी नभ से
सुख के सात रंगो की रश्मियां....
धरती को अपने मोहपाश में
आलिंगित करती हुई ,
उस दिन मैनें जाना था
खुशियों का कभी कोई एक
तयशुदा रंग नही होता
वे अपने अपने रंग में ही खुश रंग होती हैं .....
यूँ तो मुझे उसी केनवास पर
तुम्हारी इक सजीली तस्वीर बनानी थी
अपनी पसन्द के रंगों को भरकर
किन्तु ,,,,,,
तुम्हारे अचानक चले जाने के बाद
जिस केनवास पर उकेरा था तुमने मुझे
मनरंगी रंग भरकर ....
अलग अलग रँगों की
कितनी ही सौम्य लकीरें खींची
उस चेहरे पर मैंने
मगर होठों का रंग सुर्ख
गालों का रंग गुलाबी
उगती भोर और ढलती साँझ का रंग
सुनहरी होकर भी खुशरंग नही दिखाई देता......
तुम्हारे बचे खुचे रंगों की शीशियों से
खुरच खुरच कर हर रंग आज
आपस में घोल दिए हैं मैनें
सिर्फ उस एक रंग को तलाशने के लिए
जिसे आँखों के भीतर भरकर
बिखरे हुए सपने ,
आसपास के गहरे सन्नाटे
माथे पर उभरी सिलवटों में भरकर
चित्र में वास्तविक चरित्र उकेरा जा सके,,,,
जैसे तुम्हारी उंगलियों के स्पर्श मात्र से ही
पत्थर तोड़कर दरिया बह निकलती थी......
आसमान की तरफ निहारते ही
ऋतुएं आपस मे चुहल करते
फाग रचने लगती थी ,,,,
धरती को नज़रों से तनिक स्पर्श करते ही
हर तरफ मधुमास सा छा जाता था...
सुनो,,,,,,
गहन उदासी ,सन्नाटों और पीड़ाओं का रंग
शायद गहरा स्लेटी होता होगा
सात खुश रंग रंगों का मूल अस्तित्व
मिटाकर ही तैयार होता है न पीड़ा का
सिलेटी स्याह रंग,,,,,,, ?
प्रियंवदा अवस्थी
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