भीगी पाती
नितांत गहरे और सर्द सन्नाटे में
तुम्हारी यादों का लिहाफ ओढ़े
दिसंबर को एक बार फिर
जनवरी में तब्दील होते
नीरवता से निहार रही हूँ.....
तुम्हें पाकर, खोने के बाद
नींद और सपनों की आपस में
ऐसी अनबन हुई है कि
दोनों एक दूसरे की तरफ़
बेमुरव्वती से पीठ घुमाकर बैठ गए हैं
ठिठुरती देह के भीतर
सिमटती गर्माहट में
सावन अब भी उतना ही ज़िंदा है
जैसा उस आख़री पल
मैनें तुम में छोड़ा था....
नस नाड़ियों शिरा धमनियों में
अलबेली प्रीत का मयूर
मदमस्त हो नर्तन करता है
उमड़ घुमड़ मन के सघन मेघों के
झरझर बहकर थम जाने के बाद भी
मन के मौसम में जाने क्यों
कोई विशेष परिवर्तन नही होता....
उम्मीदों की किरण
पलकों पर अटकी शबनम से
टकराकर परावर्तित हो जाती है,,
मन के आकाश पर अब
इंद्रधनुषी झूले नही पड़ते,,,,,
दिन की तपिश अपना
कितना भी चरम चूमे
यादों से पसीझी गलियारी में
उमस नही पनपती.....
सीले सीले अंधकार में
हथेलियां आपस मे उलझाए
भीनी सी एक खुशबू
टहल करती मिलती है,,,
खुशबू ,,,
शायद हमारे आखिरी मिलन की......
ढलते वक़्त की मुंडेर पर चढ़
खिल उठे चांद को देख
चहककर ठिठक गई चाहते
करवटों की सिलवटों के आसपास
अक्सर कसमसाया करती हैं,,.
जिनके माथे की सिलवटें हटाते
गुनगुनाते और सहलाते
कितनी ही बार
मौन मातृत्व ने मचलकर
उन्हें खुद में भरपूर भींचा ,,,,
और जीभर कर सींचा भी......
सूरज की पहली किरण के
खिड़की पर आकर बैठ जाने तक.....
पलकों पर स्वप्नों के पुनर्वास को
हौले हौले अनगिनत थपकियाँ दीं ,,
न वे जागी और न ही सो पाई
सुनो....
तुम्हें पाकर खोने के बाद,
समय भी अब वैसा बचकाना नही रहा...
जो अंधेरों में सिमटकर बैठे डर के
साये से घबराकर
तुम्हारे सीने से लग बच्चा बन जाये
अनुभूतियों से सोंधी हुई
सच की ज़मीन पर
कुछ पल ठहरी हुई जिजीविषा को
अब उजालों की आहट से भी
बहुत डर लगने लगा है
न जाने क्यों ......
प्रियंवदा अवस्थी
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