अधूरा ग्रंथ
अतीत के पन्नों से .....
सन १९८५ में लिखी एक रचना....
अधूरा ग्रन्थ,...
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मन ...मन ही तो है...
सोचा करता है...
किया करता है...
एक ग्रन्थ तैयार करने की सोची...
नाम रखा था...''मानव""
कुछ परिभाषाएं पढ़ी
सहायतार्थ....
कुछ इस प्रकार निकली
मानव की व्याख्या ....
है सच्चा मानव वही..
जो दयावान हो..
परमार्थी ..चरित्रवान हो...
स्वावलंबी-गुणों की खान हो...
परमार्थ में जिए...
परमार्थ करते मरे
किन्तु अफ़सोस...
हमने सिद्धांत को समझा महत्वहीन ..
की व्यावहारिक खोजबीन...
देखें तो क्या पाया..??
जाने क्यूँ मन भर आया...?
परार्थ ...चरित्र की उत्तमता...?
कुछ भी कहीं नही दीखता ...
आज के मानव को
अलंकृत कर नही सकते....
हम इन आचारालान्कारो से...
था कभी जो सुसज्जित
इन विचारों से...
जो कुछ पढ़ा,,,देखा..
थी पुस्तकीय परिभाषा मात्र ...
व्यवहार में जो टटोला....
कुछ हाथ नही लगा...
सिवा कुछ गंदे भद्दे दानवीय आचारो के..
मन हुआ विफल...
और उद्देश्य निष्फल...
और रह गया ...मेरा ग्रन्थ...
मानव...अधूरा .सा...
प्रिया.....
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