यहाँ कभी कभी
#यहाँ #कभी #कभी #ऐसा #भी #होता #है
दुनिया की अनुभवी नज़रों में
अरसे से
आलिशान सा था जो एक घर ...
गलती से खुली रह गयी
खिड़की के भीतर से कल
किसी एक मकान सा
झांकता दिखा वह विकल....
रेशमी दोहरनुमा मोटे पर्दे के उस पार
टकटक ताकती
शून्य में लगातार
कोई टूटता सितारा आँकती
दिखी सूनी सूनी सी नज़रें भी........
अँधेरे की मुँडेर पर आ बैठे
चाँद के रक्तिम नैनों में
चढ़ी सी दिखती खुमारी थी
और वे नज़रे बड़ी ही काली
और बेहद कजरारी थीं .....
पर शायद ....
उसके आसमान में कहीं
जरूर कुछ दरारें थीं.....
शाम से गुलाबी होठों पर
खूबसूरती से गढ़ी गयी थी
जैसे महीन कशीदेकारी.....
ओढ़ रखी थी बदन पर उसने
झिलमिल परम्पराओं की
ओढ़नी फुलकारी......
फूंक दी हो फिर किसी ने भी
मोहिनी उस स्तम्भित चरित्र पर
छिड़क दिए हों कितने ही
सोंधे इत्र नम हवाओं ने उसपर...
सावन में टपकती हुई छत
माथे पर छलछला उठी बूंदे
दीवारों से रह रहकर उठती हुई वाष्प
कह रही थी बहुत कुछ
मौन होकर.....
कि क्या कुछ न सुलग रहा होगा
कबसे
बिना धुवां उठे भीतर ही भीतर ....
उसी घर के बाहरी दालान पर
बगीचे में ऊंघता अकेला
सजावटी हुआ सा एक गुलाब
धूप सेंकता रहता है जो
मालिक के सख्त निर्देश पर
छलता रहता है तप्त तन
दिन दिन भर,काँटों की सेज पर.....
बोल ही पड़ा आखिर
माली के मिटटी भरे खुरदरे ,स्नेहिल
हांथों से लिपटकर
ए सुन ! तू लाख कहे कि
तू है दर ब दर
बड़ा सुन्दर लगता है मुझे
तेरा फूस का घर
चल ले चल न तू ,मुझे भी उधर....
क्या जाने तू कि
कोई हरे भरे बाग़ में भी रोता है
तो कहीं एक सूखी डाल पर भी
सैकड़ों सपनो का बसेरा होता है
कई बार यहां ऐसा भी होता है
जो एक घर दिखता है दुनिया को
वहाँ सिर्फ एक ही मकान होता है
प्रियंवदा अवस्थी
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