मदमस्त और मदान्ध का भेद
एक दिन
तुम्ही ने कहा था
यूँ ही बातों बातों में
जब भी कभी जी करे,
चली आना चुपचाप
बिना कोई हंगामा किये,
ताप सन्ताप व्यतिपात के
इस जग को बिना
चिलचिलाते उलाहने दिए,,,
उपेक्षाओं से क्यों ही करना
मन का उत्पीडन
जीवन के आधारभूत तथ्य ही जब
मंडन और खंडन ,
सब कुछ ठंडा पड़ जाता है
नियति के नियत समय पर ,
वस्तुएं ,,,,,
प्रायः भस्म हो जाती हैं
विचारों के वर्तुलाकार
वलय मात्र,
शेष रह जाते हैं ब्रह्मांड में,,,,
जीवित और जीवंत में
यही तो है एक विशेष अंतर ,,,
तेरा और मेरा
यह तो हर जीवित की
जीवेषणा का है झगड़ा ,,,
मदमस्त और मदान्ध में भेद
काल की अंतिम कगार पर
पहुँच कर समझ आता है
गरिमा सदा ही ,,
मौन पथगामिनी होती है
और अहंकार पग पग
शोर करते हुए चलता है
सुनो .....
धरा और गगन के छोर पर ठहर
तुम्हारा पल भर को मुस्कराना
कहीं कुतूहल भरे दिनमान का कारण
तो कहीं शीतल निशा को
स्वप्निल आमंत्रण बन जाता है,,,
सुना कुछ तुमने ,,,?
ओ सुनहरी,,, मेरी सुंदरी ,,,,
चली आना चुपचाप,
बिना किसी शोर और उलाहने के
मन को बिना कोई पीड़ा दिए
धरती के दोनो ध्रुवो के मध्य
खिंची आड़ी पगडंडी पर
हौले हौले कदम रखकर,
इस छोर तो कभी उस छोर
हमेशा ही प्रतीक्षा करता मिलूँगा ,
बिना तुम्हारी नरम उंगलियों को थामे
कब कोई दिन उग सका ,
कब रातें सुहानी हो सकी ,,,
जीवन को गति दे जाता है
तुम्हारा निश्छल समर्पण
हर आरम्भ को परिणति ले जाती है
तुम्हारी मौन स्वीकृति....
प्रियंवदा अवस्थी
31/10/2017
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