कितने उज्ज्वल दृश्य हुए

स्पंदित हुए तार तार
मन वीणा के,पदचाप भर से....
कितने उज्जवल दृश्य हुए
तुम श्याम ! मेरी नज़र से....

झुकी झुकी सी बदलियाँ
मुख मंडल से हटाते
अलौकिक मुस्कान ,
मंद मंद मुस्कराते...

स्तम्भित से चक्षु गात औ मूक -अधर
तद्यपि गूंज उठे
मन भीतर मुखरित सप्त स्वर....

लगी सिमटने सुर्ख साँझ
नव वधू, रूप धर
श्यामल से,इक कोने में.....
चुपके चुपके पलक ओट कर
प्रियतम डग पावन हो बिखरे 
इधर उधर , कुछ सुर्ख गुलमोहर.......

प्रियंवदा अवस्थी"© 2014

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