वह आश्वस्त नज़र आई
एक दिन ज़िंदगी
ज़िंदगी देकर मुस्कराई....
बात समझ मे आई....न आई
वह रोई फिर सम्हली
और थोड़ा थोड़ा मुस्कराई
वक्त के साथ करवट बदली ,
कुछ दिन घुटनो पर चली
बैठी भी कुछ पल,
फिर ज़िन्दगी के साथ उसने
कदम ताल मिलाई......
किसी एक सुहाने से दिन
वह दो पंख ले आई.....
सहमी, ठिठकी,
फिर सुदूर गगन पर
ज़िंदगी ने ऊँची छलांग लगाई.....
बदलती ऋतु की मुंडेर पर
किसी सन्नाती सी दोपहर
वो एकांत में मिलने आई
बलखाते शर्माते
कानो में जाने क्या फुसफुसाई
सुनकर वह कुछ झिझकी
गालों पर गहराई ललाई......
शायद बात मन को थी लुभाई
गुनगुनाते भरमाते उसने
यूँ ही एक उम्र बिताई.......
इस बार जबसे वो गई
पलटकर बरसों पास न आई.....
कभी कभी बस सपनों में दी दिखाई....
पल छिन उसे यहाँ वहाँ ढूंढते
हाथ आई तो महज तन्हाई ....
एक ढलती हुई साँझ
आँगन उतरी उसकी सी परछाई
मिलने की चाहत
बेतहाशा दौड़ी ,,, छटपटाई
शायद ज़िंदगी ने ज़िन्दगी से
कुछ आस थी लगाई.....
चौतरफा सिर्फ परछाई और परछाईं
भर्राई गिड़गिड़ाई बेचारगी भी जताई
ज़िंदगी .....
ज़िन्दगी पर नज़र फिराई
कर्णभेदन करती अट्टहास लगाई
घुटनो पर रेंगती याचना
नख शिख तक तिलमिलाई.....
हुंकार उठी एक भीतर
मन को ज़िद्द की लाठी थमाई...
पोछकर आँसूं अपने
उठ खड़ी हुई,,, खिलखिलाई
फिर जब जब भी कहीं दी वह दिखाई
वह अंगड़ाई ,,,कुछ गुनगुनाई
और मंद मंद मुस्कराई,,,,,,
वक्त बेवक्त
जब भी वह फिर नज़दीक आई
जीवन ने ज़िंदगी पर अट्टहास लगाई
जाने क्यों उस दिन वह
बड़ी आश्वस्त नज़र आई........
प्रियंवदा अवस्थी
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