प्रीत के पाखी को चिंता

प्रीति के पाखी को चिंता कब कोई बंधन मिले ।
लगन लगते लौह पिंजर तोड़ नभ वह उड़ चले ।।

स्वप्न के पाँवों से बिछड़ें लाख घुँघरू नींद के
बंद हो या जागती पलकों पे मदन नर्तन मिले ।।

हो कटी जिह्वा भले और कंठ वाणी लोप हो।
मौन के तट बैठ मन सौ बात करते ही मिले  ।।

लोक के हों बन्ध या प्रतिबंध रोके मिलन को
नयन मिलते नयन सों प्रिय प्राण इक होते मिले।।

प्रीति के

प्रियंवदा अवस्थी

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