सुन रे मन
सुन रे मन.....
तेरे क्षण क्षण होते विचलन से
कदमों तले की धरा
रह रह क्यों कम्पित होती है?
यद्यपि तेरी कोई नाप न ही तौल
न ही तेरा कोई भार
न ही तेरा कोई रूप स्वरूप
फिर भी जाने कितने ही आकार
और असंख्य प्रकार ....
कभी तेरे अरूप चेहरे की
टेढ़ी चितवन की ड्योढ़ी लग
चेतना स्वेदित होती हैं
कभी अधरों की मुस्कान तले....
अवचेतना जीवन की सांस
गुपचुप गुपचुप तरीके से लेती है....
प्रियंवदा अवस्थी
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