तुम रोमांचक बहुत हो

सुनो तुम...
फिर न कहना मुझे कि...
तुम रोमांचक बेशक बहुत हो
मगर तुम्हे रोमांस करना
बिल्कुल भी नही आता
जानती हूँ मैं ..
ये भी एक अदा ही है तुम्हारी
मन के गूढ़ निगूढ़ भावों को
प्राकट्य को विवश कर देने की....
देखना चाहते हो तुम
झुकी पलकों के ऊपर
शाम के सिंदूरी सुर्ख़ सूरज सी
फिसलती हुई शर्मीली मुस्कान
लाज के रेशम का
आंखों की कोरों पर ठहर
यकायक सपनीला हो जाना.....
सुन लेना चाहते हो
अचंभित सी मुस्कान लिए चेहरे पर
उभर आये गालों के गड्ढों को
चुम्बित करती दो लटों के मध्य
लाज कुतरते हुए अधरों की
मौन अभिव्यक्तियों  का
अशाब्दिक तराना...
सच तो यही है
वासनाएं उँगलयों की पोरों पर बैठकर
देह से शतरंजी खेल खेलती हैं
और हृदय के तारों को छेड़ते
मीठी तानाकशी भरे
तुम्हारे ऐसे शब्द
रोम रोम को झंकृत करते
महसूस करते हैं परस्पर अजब स्पंदन .....
स्वासों की लय पर
झुनक उठती है आकाशगंगाओं के
नाज़ुक पैरों पर लिपटी हुई झांझरे
टटोलते नही थकती फिर
मुंदी पलकें
रात की हथेली पर टिके
अपने चाँद के चेहरे को जी भर .......
प्रियंवदा अवस्थी

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