नेक समय आएगा इक दिन

नेक समय आएगा इक दिन
सोचे मन की अभिलाषा
बोलेंगे प्रियतम मुझसे जब
मन से मन मिलती भाषा...

ऋतु घूमे ज्यों एक चक्र पे
काश प्रेम भी नियम बनाता
चतुर्मास वो मिलन सजाता
आठ मास बिरहा गाता....

चार प्रहर में क्या कैसा हो
नियति नियम तय करती है
इच्छाएं चल अभिग डगर पर
डगमग जगमग करती हैं...

ओ निर्मोही प्रिय तुम जब से
बरस मेघ संग निकल गए
पलट न देखा भूषण मन के
सजनी के कब किधर गए.....

कट जाते जग संग उजियारे
रात सपन बन बन बिगड़े
हर करवट पे याद उलझती
नींद पलक ना हाथ धरे.....

सखियों से सुन बात मिलन की  
हूक हृदय तन पीर बढ़े
फिर मत पूछो बिना बात के
कंठ रुंधे अति नीर बहे.....

ताना दे सौंदर्य गात का
क्यों विरहा का अधिकारी
दिन तो कट जाते उजास में
अह निशा पड़े अतिशय भारी....

एक समय आएगा अपना
सोचे मन की अभिलाषा
बोलेंगे प्रियतम मुझसे जब
मन से मन मिलती  भाषा
प्रियंवदा

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