क्षितिज की मुंडेर पर

क्षितिज की मुंडेर पर
पसरी हुई
चटक स्याह ओढ़नी को हटाते
चाँदनी के आंगन के
उस पार
ठीक पीछे वाली
सघन नीम की छाँव के तले
सुकोमल उंगलियों से
समय की भुरभुरी मृदा पर
अबूझी आकृतियाँ बनाते मिटाते
बार बार मंद मुस्कराते
खेलते देखा है
अक्सर ही मैंने तुम्हें.....

ऐ ज़िन्दगी.....
ऐ वक्त....
तेरी इस धूप छाँव की
लुकाछिपी से जूझते
तुझे समझते और बूझते
माथे पर ढुलकी अलकों की
रंगत बेरंगत है हो चली 
मन को ठहराव के
अनवरत पाठ पढ़ाते
एक तू ही है जो न बदली
और एक वो 
जो भुरभुरी माटी कुरेदते
उससे रह रह खेलते न थका ....
प्रियंवदा अवस्थी

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