तुम कहते हो मैं रोती हूँ
नयनो के जब आशा मुक्तक
किरणों की डोर पिरोती हूँ ।
एक स्वर्णिम भोर सँजोती हूँ
तुम कहते हो मैं रोती हूँ ......
शब्दों में कब बाँधा तुमको
भावों में रंग रंग रीझी हूँ
मुझमे जो तेरा बसा हुआ
हर उस स्मृति से भीझी हूँ ...
कोरों पे रख सब स्वप्न तेरे
पोरों को जब रच लेती हूँ
तुम कहते हो मैं रोती हूँ.......
कालचक जग का निश दिन
ऋतु आगत निर्गत है क्रीड़ा
मकरन्द सुगन्ध प्रीत रख के
कर बंद नैन सुख दुख पीड़ा
तम सघन काट स्वासों अपनी
नव उषा अधर रख देती हूँ
तुम कहते हो कि मैं रोती हूँ .....
ये अनबोले है कुछ बोल प्रिये
शब्दों मत इनको तोल प्रिये
प्रीत भरे हर आश्वासन तेरे
तन मन लेती जब घोल प्रिये
झिलमिल सी हूँ हो उठती
और कण कण तुम्हे सँजोती हूँ
तुम कहते हो मैं रोती हूँ
प्रियंवदा अवस्थी 2015
Comments
Post a Comment