अरे लखिया बाबुल न यूँ कर पराई

अबकी बरस कैसा सावन ये आया
पीहर से अब तक सँदेसा न आया
तके राह अँखियाँ कि राखी है आई
ओ लखिया बाबुल न कर यूँ पराई।।

भूला वचन वो जिसने डोली उठाई
सदा हाथ सर होगा बोला जो भाई ।
बरस बीता देखे ममता की अंगनाई
अरे लखिया बाबुल न यूँ कर पराई।।

करूँ लाख कोशिश छूट पाए न डोरी।
भले हूँ बियाही पर अब तक हूँ तोरी।।
पाला धरम रीत पीर की यह निभाई ।
अरे लखिया बाबुल न यूँ कर पराई ।।

चुनके दुआएं नेह की डोरी हूँ तागी
लगी न झपक कितनी रातों मैं जागी ।।
बदरा घिरे मन और पूनम देवे दुहाई।
अरे लखिया बाबुल न यूँ कर पराई ।।

लोचन थाल रोचन ले बहना खड़ी है
शहद घोलती आस दीपक जगी है ।।
चले आओ पंछी ही बनके कन्हाई
अरे लखिया बाबुल न यूँ कर पराई ।।

नही चाहती तुमसे गहने और कपड़े
करी थी ठिठोली बचपन के झगड़े।।
ले जा दुआ उतारूं मैं हर एक बलाई ।
अरे लखिया बाबुल न यूँ कर पराई।।
प्रियंवदा अवस्थी

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