अन्धकार में प्रकाश निहित
अन्धकार में प्रकाश
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दिनों दिन मीठी होती गई
ज़िन्दगी....
तुम्हारे प्रेम में..
कसैले नही लगते अब
कोई कटाक्ष.....
गहरी होती गयी आस्थाएं
उथले होते गए भ्रम सारे
नश्वर है ये देह जानती थी
किन्तु मानने लगी हूँ ...
जबसे संक्रमण हटने लगे
वासनाओं के...
विकार विलोम हो गए
जबसे अनुलोम हुई
अनुरक्ति तुम्हारी ...
सहज सरल सुयोग है
तुम्हारा मेरा प्रेम
मिलन परिणति नही
वियोग ही संयोग का सोपान...
ज्ञानी थे तुम
सिखा ही गये मुझे कि
"अन्धकार में ही प्रकाश निहित है"
प्रियंवदा अवस्थी2013
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