तुम हाथ छिपाये रंग पिया

तुम हाथ छुपाये रंग पिया
सब खबर मुझे है
तेरे चंचल नैन सधे क्यों हैं
सब खबर मुझे है
हाथ बटाने को क्यों आतुर
भोर भये से कारज मेरे
रंग ढंग ये बदला बदला
खोल रहे सब राज तेरे
ऊपर से दिखते मौन मगर
मन क्यों है मस्त मलंग
सब खबर मुझे है....
आये जबसे परदेस मंझाके
कर रहे बहुत ही सेवा
खिला रहे शबरी के माफिक
चख चख के लाये मेवा
बिन बांटे सिल पर ये कैसा
अँखियों चढ़ा भंग सा रंग
सब खबर मुझे है...
नही बिसरती मोहे पियु वो
पार बरस की होली
घर आँगन अट्ट औ बगिया
थी कोई जगह न छोड़ी
कर मनमानी बहुत भिगोया
जाने कौन निकाली रंज
सब खबर मुझे है..,,,

प्रियंवदा2015

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