बिन मांगे क्या कुछ दे सकोगे
बिना मांगे कहो क्या कुछ दे सकोगे
दबे अश्क चमकती हँसी दे सकोगे ।।
खुरदरी हो चली है उमर की हथेली
ज़रा सी मोहब्बत ए नमी दे सकोगे ।।
रिगटते फिर रहे कचरों पे नवजात
गज भर की उनको ज़मी दे सकोगे।।
तरसे हैं बहुत खिलने को जो गुलाब
काँटों से उनको तुम कमी दे सकोगे ।।
चिटक पड़ने को हैं कली डालियों पे
आबो हवा धूप उन्हें नमी दे सकोगे ।।
चूमना चाहती है जो ख्वाहिश आसमां
भरोसे के हाथों में तुम डोर दे सकोगे ।।
बिना मांगे कहो क्या कुछ दे सकोगे,
प्रियंवदा अवस्थी
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