कुछ क्षणिकाएँ
1
एक तू ही नही मुझमे जीता ए शहंशाह ए दिल मेरे
कुछ तो हम भी कहीं तुझमे जीने का हुनर रखते है
मिजाज़ ए बयां कैसा भी हो वक्त बुरा हो या भला
मेरे अल्फ़ाज़ तुझे हरदम लूटने का भी दम रखते हैं
इस जिस्म की मानिंद मिल भी जाये कोई सूरत तुझको
शिद्दत ए इश्क न मिलेगी कहीं हम ऐसा जिगर रखते हैं
प्रियंवदा
2
तुम्हारी लहरों का यूं खामोश हो जाना
मुझमे कहीं समंदर सा खलबलाना
सारी कायनात एक पहेली बन जाती है
तेरी ख़ामोशी क्या कुछ बदल जाती है ।।
मन का ताप फिर चरम चढ़ उबलता है
कुछ तो है जो कण्ठ तक आ चढ़ता है
गर्द ओ गुबार से ये आँख भर जाती है
ये ख़ामोशी शायद बादल वहां बनाती है ।।
प्रियंवदा
3
शिष्टता और विशिष्टता में
फर्क सिर्फ इतना ही
कि कोई जब भी तुझसे रूठे
तू उसके आगे बस एक सज़दा कर दे
जो कभी तुझसे ज़िन्दगी ही
लगे किसी बात पर रुठने
तू उसके आगे एक नयी सी ज़िन्दगी रख दे
प्रियंवदा
4
मुझमे वो ऐसे मिला फिर मेरा रहा न कोय
पांचों घर ठग ले गया, के बिधि काया ढोय
प्रियंवदा
5
पावस पावस कर रही तृण तृण निकसी आह
चरम ताप ले रबि चढ़ा किरण निकाले डाह
आयसु देहु सिंधु घन अब तजो मोह के पाश
तन मन तर शीतल करे बिरथ न जाये आस
प्रियंवदा
6
रजनी रचने चल पड़ी दो नयनन में स्वप्न
चिन्हित करती जा रही कहाँ रखे वह रत्न
मौन खींच शशि तक रहा निद्रा के नव तन्त्र
भीगी पलकों बैठकर ,तारक गण फूंके मन्त्र
प्रियंवदा
7
बूँद बूँद को तरसे धरती
बूँद बूँद तरसाये बादल
आस न छूटे त्रास न टूटे
तन कायल या मन पागल
प्रियंवदा
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