एक नदी कभी खारी नही होती
एक नदी कभी खारी नही होती
पर्वतों से ढलकर,
धरती पर उतरकर
पथज मालिन्य ढोकर भी
सागर के प्रेम में घुलकर भी,,,
वस्तुतः
नदी की चिरजीवी जीवेषणा
उसकी अंतहीन मिठास
स्वतः में निरन्तर
समाहित करने की आस,
सागर के सृष्टि नियोजन
अथवा,
पुनरावृत्ति सिद्धांत पर
सदा ही भारी हुआ करती है ,
इसी लिए शायद हर बार
क्रमवार लगातार
वह उसके पिघलते ही
जमीन पर उतरते ही
आह्वाहन करने लगता है
अपनी विशाल भुजाएं फैलाकर
उसे कर्म पथ की नित नित
ऊँची नीची नवल डगरें सुझाकर
कितने भी दोष गिने हों
एक संसार ने ,
सागर के खारे जल में
डटा रहता है फिर भी अथक
वह मध्यस्थ नभ थल में
जीवन के नियम को समझाता
कदाचित,
लिपटा त्रिशंकु की भांति
सृष्टि के इस चक्र रण में
वह कभी वर्तमान नही पीता है
नदी में समाहित
विषमताओं को पीता है,
लीलता रहता है गम्भीर सागर
नदी के उच्छ्रंखल अहम् को
आदि अनादि, पथ प्रशस्त करता है
पुनः एक और नदी के उदगम् को
पूर्णता को सम्पूर्णता का सबक
सिखलाना चाहता है एक सागर
ताकि दम्भ न हो जाये नदी को
अपने अस्तित्व के ज्यादा ही
मीठे होने का ।।
ताकि उसे भी पता चल सके
कारण एक सागर की
मिठास खोने का
बतलाना चाहता है वह उसे
मिसरी के निवालों से
निश्चित ही आदि होती है
और एक कटु सत्य,
नीम से फिर अंत होने का
ताकि,
ज्ञात हो सके उसे भी कारण
उसके सागर होने का
प्रियंवदा अवस्थी
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