स्त्री हूँ मैं (प्रकाशित)

हाँ स्त्री हूँ मैं
सृष्टि की सर्वोत्तम कृति
सम्पूर्ण सृष्टि हूँ मैं
नयनों का यदि आह्लाद हूँ 
कदाचित आराध्य भी हूँ मैं
क्योंकि -
जननी हूँ मैं, भरणी भी हूँ मैं
अबला नही ,सबल भी हूँ मैं
मेरा अबला -स्वरूप 
शीतल छाँव सा है ,

जलती हुई धूप...
निर्बलता का कत्तई नही वो प्रतीक

यही है मेरे कर्मपथ की लीक
विनम्रता है ये मेरी 

और यही है 
सच मायने में स्त्रीत्व ....
स्वत्व को जानती ही नही हूँ
जीती और पहचानती भी हूँ मैं

अभिमान और स्वाभिमान में

फर्क करना जानती हूँ मैं
हाँ स्त्री हूँ मैं...
पुरुष और पुरुषत्व को 
सम्मानित करना जानती हूँ मैं
हाँ स्त्री हूँ मैं ,
स्वीकारती हूँ सृष्टि के सत्य
जीवन के आधारभूत तथ्य
हृदय से अभिनंदित करती हूँ
शिव और शक्ति का 
अकाट्य आध्यात्मिक
समन्वय और सामन्जस्य,,,,
स्त्री यदि जगमग रंगमंच है 
तो पुरुष बनता है उसका नेपथ्य,,,
स्वीकारा है मैंने तुम्हे सहज ही
क्योंकि तरल हूँ मैं ,घुलनशील हूँ मैं
स्त्री हूँ मैं , सृजनशील हूँ मैं 

शक्तिस्वरूपा कही जाती हूँ
आदि अनादि काल से ही
अहंकारी हो विध्वंस करना
मैंने कभी सीखा ही नही
कदाचित खुद में कहीं
पुरुषत्व को भी तो जीती हूँ मैं
कोटिश विषमताओं से जूझकर 
कदाचित ही कभी रीती हूँ मैं 
हाँ स्त्री हूँ मैं , समर्पण हूँ मैं 

यदि देह के रूप में प्यार हूँ मैं
सृष्टि के रूप में सम्पूर्णता भरा

प्रकृति का सहज श्रंगार हूँ मैं
प्रेम का पहला अध्याय भी हूँ
प्रणय का आधार भी हूँ मैं
लता हूँ मैं  ,पुष्प भी हूँ  यदि
तो तीखी तलवार भी हूँ मैं

नाविक बनो जो तुम
तो पतवार हूँ मैं
सरलता से समझो तो 
बारिश की सुहानी फुहार हूँ मैं

जो न समझो  तो 
क्रांति का क्रुद्ध बीज
और प्रलय की ललकार हूँ मैं
हाँ स्त्री हूँ मैं।।

Comments

Popular posts from this blog

मत बीतो ऐसे तुम मुझमे

बहुत दूर चलना एकाकी

पतझर के मौसम जवानी की फुनगियां