रख हृद पर हाथ जरा सोचो
जन गण मन अधिनायक गाते
देश ध्वजा हर्षित फहराते
प्रति वर्ष बहुत इठलाते हो
रख हृद पर हाथ जरा सोचो
किस बात का जश्न मनाते हो
सन् सैंतालीस नही अब यह
जब बेड़ी से था यह मुक्त हुआ
जन मन की बलि जब चढ़ी यहाँ
तब जाकर सब उन्मुक्त हुआ
उत्साह असल तो वो ही था
क्यों अब झूठे पकवान पकाते हो
रख हृद पर हाथ जरा सोचो.....
जन मन अब भी जकड़ा ही है
आतंक खौफ हर तरफ यहाँ
कहीं बेटी कूड़े ढेर पड़ी
कहीं अस्मत लुटती रोज यहाँ
तुमने तो कुछ भी किया नही
पुरखों पर फूल चढ़ाते हो
रख हृद पर हाथ जरा सोचो...
कहने को हो विकास पथ पर
कितनो के भरते पेट नही
कागज़ पर महल बनाने भर से
इस असल को सकते मेट नही
भीतर फीके सामान रखे
ऊँची दूकान दिखाते हो
रख हृद पर हाथ जरा सोचो...
उद्धार गरीबी करने को
संकल्प बड़े करतब छोटे
जिनके घर जितने भरे हुए
उतने ही उनके मन खोटे
शंखनाद खोखल लगते
और छिटके बिगुल बजाते हो
सोचो रख हृद पर हाथ जरा सोचो....
सविधान बहुत लंबा चौड़ा पर
नियम कहीं दीखते हैं क्या
जुबान लाख उर्वर उससे
बिन अमल फसल उगती है क्या
खोखल ईमारत रेशम ढककर
क्यों पोले ढोल बजाते हो
रख हृद पर हाथ जरा सोचो...
जिसकी लाठी जितनी मोटी
हर उस आँगन ही भैस बंधी
कमतर क्या जाने अधिकार यहाँ
क्या है दूध मलाई और क्या घी
सब नियम कायदे ताक़ रखे
अधिकार जहाँ लूट जाते हों
सोचो रख हृद पर हाथ जरा.....
अब भी तो जकड़े हम बेड़ी में
गणतंत्र कहीं दीखता है क्या
आँखें खोले बिन नई भोर
पूरब सूरज मिलता है क्या
इतिहास बताकर दुनिया को
बस झूठी शान दिखाते हो
सोचो रख हृद पर हाथ जरा
किस बात का जश्न मनाते हो....
प्रियंवदा।
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