ख्वाहिशों के पंख
उम्र भर की ख्वाहिशों के
पंख जब उगने लगे
सैकड़ों चिड़ीमारों के
जाल छत बिछने लगे,,,
देख पाया कौन किसके
हौसलों को डग भरते हुए
बगल में दाबी छुरी औ
वाहों आह भरने लगे,,,,
दोहरे चेहरों से पटा है
जर्रा जर्रा जमीन का
साजिशों की कोशिशें
कि दाल कब गलने लगे,,,
हैं छिपी कातिल निगाहें
मुस्कराहटों की आड़ में
पर कुतरने की तलब ले
तिनके जमा करने लगे,,,,,
तोड़ देता है भरम फर्क
अपनों और गैरों का यहां
अजनबी परवाज़ देते और
अपनों की दुआ घटने लगे,,,,
दर्द की इस दास्तान का
किस्सा फ़क्त अपना नही
देखना एक उलझी हथेली
कोई आँख जो नमने लगे,,,,
प्रियंवदा अवस्थी
Comments
Post a Comment