बोनसाई

   प्रेम ,,,
तुम्हारी पीड़ा गहरी  समझ आई
नही बनानी मुझे रिश्तों की बोनसाई,,,,

मन की अनन्त गहराइयों में उतर
मौलिकता को कुरेद और कुतर
हृदय से हरगिज़ खेल नही सकती ,
व्योम सी तुम्हारी व्यापकता 
 जबरन उथले  ठेल नही सकती
ऋतुओं संग चढ़े बढ़े तेरी तरुणाई
तेरी जंगली प्रवृत्ति सदा है लुभाई

नही बनानी मुझे रिश्तों की बोन्साई......

समय के साथ भले ही हैं हो गए 
संकुचित से घर औ पथरीले शहर
प्रेम की कोमल फुनगियां नोचकर
शाखा से शाखा के
नही करना स्वार्थ का ऐसा संवरण
 

मुझे नही बनानी रिश्तों की बोन्साई
मुझे नही बनानी रिश्तों की बोन्साई
प्रियंवदा अवस्थी

Comments

Popular posts from this blog

मत बीतो ऐसे तुम मुझमे

बहुत दूर चलना एकाकी

पतझर के मौसम जवानी की फुनगियां