इस सन्नाटे में


इस सन्नाटे में 
अजीब सी सुगबुग है
किसी की आहट लेती
मौसमी धुंध कुछ यूँ चुप है
देखा है मैंने 
कितनी ही बार
पत्तो पत्तों पर
धूप को सुनहरी पातियाँ लिखते
दिन दिन भर
कितने इत्मीनान से 
जिन्हें संग लेकर
फिसल जाया करती है सांझ.....
शाखों से उतर ...
रख देती है जाकर ,अंधेरों की आड़ 
चुराते सबसे नजर .....
मुझसे होकर तुम तक संप्रेषित
कितने ही ऐसे तप्त अव्यक्त 
अभेजे संदेसो को अब
आखर दर आखर पढ़ रही हैं...... 
सांय सांय करती ये हवाएं.....
खामोशियों को सुन सकना
तुमसे ही तो सीखा था मैंने
याद है न ?
वो तुम्हारा हर अनकही को
कनखियों से भांप लेना
और फिर वो मेरा 
नज़रों उथलाता बसन्त 
मुंदी पलकों से आँक लेना......
प्रियंवदा अवस्थी©2014

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