अभेजे सन्देश भूमिका
बस यूं ही......
दिन उगने से लेकर सांझ के आगोश में समा जाने को क्षितिज की मुंडेर पर आकर अटक गया सुर्ख सूरज जाने किस गली किस डगर भटककर ज़मीन का पूरा ताप संताप अपनी झोली में भरकर आहिस्ता आहिस्ता गहरे सागर में उतर जाने को लालायित दिख रहा था ।
शीतल चंचल लहरों की चादर बार बार खींचकर अपने मुख पर ओढ़कर मानो अब वह निश्चिंतता की नींद सो जाना चाहता था ।
घर से निकलते समय मन में तो यही था कि आज मेरे जेहन की सारी हलचल साथ लाये इन पन्नों पर लिखकर हर्फ हर्फ उसकी ओर बहा दूँ ।और वह कतरा कतरा इन्हें समेटकर कहीं एकांत में बैठकर लम्हा लम्हा आज सिर्फ और सिर्फ मुझे ही पढ़े ।कंठ तक खट्टे मीठे अनुभवों से लबालब भरी ज़िंदगी ज़रा सी हल्की और कुछ तो खाली हो जाती ।
क्योंकि तुम्ही हो जो अक्सर मेरी आँखों मे सहमी नमी को देखकर उलझा हुआ सवाल करते रहे हो बरसों से ।जब जब भी मैनें इस नम रेत पर ठहर अपनी रूखी सूखी सी हथेलियाँ रखी हैं।
मन सदा ही शून्यता की तलाश करता रहता है और जीवन कभी इसे शून्य होने देता है भला? पैमाना ही कुछ ऐसा गढ़ दिया है संसार की रचना करने वाले ने कि जितने लफ़्ज़ों के साथ बाहर यह अभिव्यक्त होता है दोगुने भावों को साथ लेकर भीतर बटोर भरकर फिर से अपनी सल्तनत सम्हालते अकड़ कर बैठ जाता है। फिर दैनिक दैहिक जीवन की धरा पर उगे नये नये शब्द नये से प्रतीक प्रश्नों के अस्त्र शस्त्र और परिष्कृत तथा सर्वमान्य उत्तर तलाशना शुरू कर देते हैं हम और हमारा मन मस्तिष्क।
आज जो कुछ भी लिख रही हूँ यह मानस पटल पर चित्रित कुछ अलग सी ही स्मृति है । जिसका रंग निराला तथा भाव व्यंजना में विस्मय और वैचित्रय ।न यह कहानी है न कविता न कोई नाटक न संस्मरण न ही किसी को लिखा पत्र।परन्तु इसमें मेरे तुम्हारे कहे सोचे से बहुत कुछ मिलता जुलता सा है। बिल्कुल पृथक तरीका मन से की कह लेने का ।
गूढ़ निगूढ़ निहित तथ्य सिर्फ एक कि तुम्हें बहुत कुछ सुनाना चाहता है मन ।तुम जो हो भी और नही भी । इस तुम की तलाश में लगा एक चित्रकार मन जो अक्षर अक्षर सत्य तो है किंतु प्रत्यक्ष नही है । नित्य ही जाने क्या क्या उकेरता रहता है भीतर ही भीतर जो कदाचित व्यक्त होकर भी अव्यक्त है।
बात ये की सत्यता को सदा प्रमाण चाहिए और मेरे पास मात्र परिमाण है अनगिनत अपरिमित भावों का जिन्हें में मेरे भाव अर्थों की नमी देकर शब्द के साथ गूँथ सकती हूँ । तुम्हें मुझसे और बेहतर तरीके से मिलवाने को ।
बेपरवाही का आँचल ओढ़े जब तुम तक आने को मैं बस यूं ही अचानक निकल पड़ी थी ।तब जूही के फूलों से लदी मन्द किन्तु मादक खुशबू भरी बेल की एक शाखा अचानक ही गिरकर लिपट गयी थी मेरे अस्त व्यस्त बालों में । उसे छुड़ाते वक्त ये मेरी कलम भी अटक गई थी कुछ देर को वहीं ताजी कोंपलों की मुलायम शाखाओं से।
सोचा तो यही था खुशबू में लपेटकर ही सही आज तुमसे मैं सिर्फ दर्द कहूंगी ।पर क्या कहूँ जब जब भी मैं तुम तक आती हूँ ।तुम्हें इस भाव से निहारती हूँ कि बस आज तुम्हारे हर उस प्रश्न का सम्यक उत्तर तुम तक पहुंचा ही दूँ ।तुम मुझे यूँ ही लहरों लहरों पर अपने दिव्य पांव रखे सारे जग की पीड़ा को लपेट चौतरफा शांति और शीतलता का दान करते प्रतिकार की भावना से रहित कनखियों से मुस्कराते हुए मिले ।
बिल्कुल पहली नज़र के इश्क सेे ।
तो रहने दो न तुम । मत करो ऐसे प्रश्न।ये पीड़ा के खेल इस जग हंसाई करने वाले जग को ही खेलने दो।
सुना है दर्द कहने से सदियों का इतिहास पुनर्जीवित हो उठता है । यूँ तो मौन तुम और मैं दोनों ही ढलती सांझ से सुनहरे दिखते हैं एक दूसरे को आंखों आंखों में निहार कर कुछ सुर्ख और कुछ कुछ शीतल .....
बिल्कुल पहली नज़र के इश्क से ।
प्रियंवदा अवस्थी ,
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