जरा सम्हल के
वो मेरा बाल स्वप्न,,
निश्छल-कोमल-चंचल
आँगन की नीम तले
कच्ची ज़मीन पर खेलते
जाने कब गुलाब चुनने लगा
काँटों से उलझ...
कब कैशोर हुई उसकी छवि
कब गुपचुप सँवरने लगा
दुनिया की ओट,,,,
नज़र ही न गयी उसपर...
प्रेम गीतों गुथे शब्दों के
अंजान अर्थों से
क्या जाने कब सुलझाने लगा
वो ज़िन्दगी,,,,
शुबहा ही न हुई आईने को,,,
किसी एक सर्द अंधियारी रात
छज्जे की मुंडेर से लग
ओस भीगी पाती जो लिखी
उसने सजीले चाँद को ....
सितारों की चुहल देख चाँदनी
आँचल को ढाँकते
आकर कानो में फुसफुसाई
"नाज़ुक बहुत है उम्र"
और मौसम कुछ सर्द
जरा सम्हल के......
प्रियंवदा अवस्थी
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