क्षीर सागर उतर जाना
चाहत की गहराइयाँ नापनी थी
उसे शायद,,
जो एक बार फिर प्रतीक्षाएँ बाँध गया
अमराइयों के ठौर.....
झर झर पड़ी कदमों
मुरझाये अमलतासों सी
वासन्तिक प्रीत
अधीर नयनो की कोर....
कब तक खिले रहेंगे
आशाओं के सुर्ख गुलमोहर
ओढ़ ही बैठेंगे वो एक दिन
तप्त स्मृतियों के दोहर...
आँधियाँ उठेंगी ज़मीन
आच्छादित हो उठेगा गगन
सघन घनघोर,,,,
बरस बरस पड़ेगी प्रीत
तोड़ हर बन्ध, हर छोर...
अविरल इस जल का प्रिय
बस एक ही ठिकाना
नापनी हो गहराइयाँ तो फिर
क्षीर सागर उतर जाना.....
प्रियंवदा अवस्थी
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