कहो क्या ऐसी कोई प्रीत

कहो क्या ऐसी कोई प्रीत रीत
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सज धज वो डोली आई थी
लाखों अरमान संग लायी थी
एक छोर लहू को रख सहसा
एक डोर बंधी चली आई थी
कहो क्या ऐसी कोई प्रीत रीत
तुमने भी कभी निभाई थी

एक माटी से दूजी आकर 
खुद मुरझाई जड़ें जमाई थी
एक उपवन महकी खिली बहुत
मन मधुबन नया बनाये थी
रही लाड़ो पली लली कितनी
सब रीति समझ अपनाये थी

एक एक खटके  जगते सोते
प्रतिपल अंतस दहशत जीते 
एक नए देश और नए भेस में
जहाँ समता ममता परछाई थी

कच्चे धागों की आड़ लपेटे
जिसने रिश्तों के ताने बाने
खींचे हर तन्तु पृथक उसको
सब उसको ही पड़े सुलझाने
दो हाथों जिसने एक समय
सौ मांगों से वफ़ा निभाई थी 

जन्म जन्म के रिश्तों पर
विश्वास हृदय जीती है जो
समदृष्टि कभी देखो उसको
हर दर्द सहज पीती है जो
दूजों के चेहरे खिले देख 
वो जो रोम रोम मुस्काई थी

शमन दमन चाहत करते
सहज विषम विष भी पीकर
ममता जागी भले रात रात 
 भोर उठ पड़ी कमर कसकर
रहे हाथ घाव कितने फिर भी
वत्सल मन रोटी पकाई थी

घर बड़ा मिला या फिर छोटा
उसको माने जो प्रिय का गाँव
मिली चादर छोटी या लम्बी
रखे भीतर मर्यादा के पांव
कड़वे फल चख मीठे परसे 
शबरी सी भक्ति जताई थी

संसार रचे जो जप तप कर
परिवार बढाये खुद कटकर 
दायित्वों के एवज भूखी
सरका दे अपनी थाली तक
अधिकार मांगते ही जिसको
बस खाली झोली दिखाई थी 

तन मन जीवन करते अर्पण
बने जननी भी और भरणी भी
सदा पिता पति पहचान बने
दो घर पर जिसका नाम नही 
कहने को अपनी कही गयी
पर बरसों तक सुना परायी थी ....

कहो क्या ऐसी कोई प्रीत रीत
तुमने भी कभी निभाई थी

प्रियंवदा अवस्थी@कॉपीराइट

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