काबिलियत शब्दों में नही भावना में होती है

क़ाबिलियत शब्दों में नही
भावना में होती है

एक दिन
उसने कहा था मुझसे
काबिलियत शब्दों में नही
उनमे लिपटे भावों में होती है

दरअसल भावनायें ही  
कविता की असल जननी होती है

जीवन के ककहरों की
यूँ ही किसी एक
सुनसान दिन 
तप्त हथेलियों पर रख 
उनकी एक एक कर
गिनती करते यकायक

किसी मूक स्पर्श से 
ध्यान भंग सा हो जाता है
एक अदद दृश्य जब
जीवन का असल पहाड़ा
सिखला जाता है

जेठ की चिलचिलाती धूप
एक सूनी सी दोपहर
समय की मार सहकर
पुराने हुए से छज्जे की
जर्जर हुई सी मुंडेर पर बैठकर....

बूढ़ा हो आया एक चिड़ा 
घायल हुई अपनी चिड़ी को
रह रह कर आकर
अपनी खोटी चोंच से
बूँद बूँद कर पानी पिलाता है

नैनो से होकर कुछ नम सा
कण्ठ को वेधकर
दिल तक उतर जाता है
भीतर जो बहुत देर तक 
मचलता है.... फड़फड़ाता है,...

दवात के ह्रदय लग तब
एक कलम कुलमुलाती है
शब्दों में सीझकर भावना
पन्नों पर फिसल जाती है

कभी वो कितना हँसती है
तो कभी जीभर कर रोती है
सच ही कहा था उसने मुझसे
काबिलियत शब्दों में नही
भावना में होती है...,

प्रियंवदा कॉपीराइट रिजर्व

Comments

Popular posts from this blog

मत बीतो ऐसे तुम मुझमे

बहुत दूर चलना एकाकी

पतझर के मौसम जवानी की फुनगियां