मन निकल गया उस पार
मन निकल गया उस पार
बिसरे हुए कुछ प्रेम गीतों की धुन
उनसे हुई दूरियों नापते हुए मन
करते कितने ही श्रृंगार
निकल गया फिर से उस पार
लगा झूलने सहसा ही वो
पकड़कर इंद्रधनुष की डोर
पेंग बढ़ाते उठा गगन की ओर
प्रीत पुरजोर अह प्रीत पुरजोर
सघन गहन गगन छाये घन घोर
मन मयूर नाच उठा भर जोर
पियु पियु चहुँ दिशि फिर शोर
अह पियु पियु का शोर
बूंदें छिड़की तन मन पल्वित
खोले खिड़की दामिनी मुखरित
गरज चमक उठी पोर पोर
अह तड़क उठी पोर पोर
पवन वेग झरझर बह जाये
उडी चुनर प्रिय मन मुस्काये
चपल नयन की कोर
अह चपल नयन चितचोर
तृप्त विटप धरा हुई पुलकित
बरसे मेघ हुई छमक सुवासित
जल ही जल हर ओर अह
थल चन्दन चन्दन प्रति छोर
प्रियंवदा अवस्थी @कॉपीराइट
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