एक दिन तुम आये बसन्त से
एक दिन तुम आये जीवन मे
मधुरम मधु मधुमय बसन्त से....
बस अन्तस् अतिशय गहराए
रन्ध्र रन्ध्र रतिमय बसन्त से
भ्रमित नेत्र औ शुष्क अधर थे
डगमग डग पग डगरमगर थे
आस धरा रवि ताप शिखर था
स्वप्नों के गृह कठिन प्रहर थे
सहसा पवन कान लग बोला
पोर पोर ठिठुरन हृद डोला
उलझ सुलझ घुँघर अलकों से
इक भँवरा संग चित के खेला
ओस कपोलो चुनकर प्रीतम
इठलाये उपवन बसन्त से......
श्रावण सीझ गया तन मन को
भाद्र बटोरे गंध मदन को
शिशिर हाथ शीतलता बैठी
गुंथे शीत बिरहा मोतिन को
दिशा फेर प्रिय जब मुस्काये
लाज ओढ़ बैठी अंचल को
झंकृत रोम रोम अनबूझी
कण कण तुम दमके बसन्त से.....
प्रियंवदा
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