नारी
कि मन क्यों व्यग्र करती हो
क्यों निज सुख भग्न करती हो
जलाती बेवजह जीवन
आत्मा रुग्ण हो करती
तुम्ही तो श्रृष्टि हो सारी
तुम्ही हो हाँ तुम्ही नारी
तुम्हारे हाथ में नभ है
तुम्ही से ही यहाँ सब है
तुम्ही जननी तुम्ही भरिणी
मन क्यों दग्ध करती हो
ज़रा सी बात मन ढहना
जगत की रीत है कहना
करो प्रतिकार अनुचित का
नही बंधन सदा सहना
सहज हो तुम कठिनतम भी
हृदय रखती, दया करुणा
बराबर तुम खड़ी सुख दुःख
सरल हर पंथ करती हो
क्यों दुःख के यज्ञ करती हो
क्यों मन को व्यग्र करती हो.....
प्रियंवदा
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